अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       तीन कुंडलिया

 


छाया में अनुवाद

आओ हम उस वृक्ष में, डालें पानी–खाद
जो करता है धूप का, छाया में अनुवाद
छाया में अनुवाद, उसी से संभव जीवन
हमें सौंपता वृक्ष, सदा से अपना तन मन
अनुपम यह उपकार, वृक्ष का भूल न जाओ
रखकर समुचित ध्यान, खाद पानी दें आओ


अँधियारे का दोष
सूरज पर उँगली उठा, वे करते परिहास
अँधियारा जिनका रहा, जीवन का इतिहास
जीवन का इतिहास, रहा है जिनका काला
बैठे वे ही आज, लगा कर सच पर ताला
रहे उजाला लील, बने विषधारी अजगर
अँधियारे का दोष, मढ़ रहे वे सूरज पर


गुलमोहर
धरती तीखी धूप की, चुभन गई तब भूल
जब उससे झड़कर मिले, गुलमोहर के फूल
गुलमोहर के फूल, बिछी ज्यों लाल चुनर है
हरते भू का ताप, कि कितना नेक हुनर है
गुलमोहर के फूल, सजाकर धरा सँवरती
भूली अपना ताप, हो गयी पुलकित धरती

- राहुल शिवाय
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter