१
कुंडलिया
दिवस
कुंडलिया लिखने लगे सबको देखा आज
दिवस कुँडलिया मना रहे छोड़-छाड़ सब काज
छोड़-छाड़ सब काज, मजेदारी में डूबे
बाँध रहे सब लोग, आज ऊँचे मनसूबे
कहे पूर्णिमा सत्य, रचेगा जिसका बढ़िया
छप जाएगा शीघ्र, उसी का ही कुंडलिया
२
संपादन
करते करते थक गए, संपादन हम आज
कुछ कुंडलिया सही हैं कुछ के बिगड़े काज
कुछ के बिगड़े काज, न सुलझे कोई धागा
बार बार फिर खड़ी हो रही कोई बाधा
यति गति छंद सुधार, वर्तनी धरते धरते
बहुत लगाया ध्यान थक गए करते करते
३
एक दृष्टि से
लगता है सब ठीक है एक दृष्टि से अंक
छोटी मोटी भूल का लगे न कोई डंक
लगे न कोई डंक न कोई लेखक भड़के
मिल जाए यह सुबह-सुबह सबको कल तड़के
रचनाओं में खिली, हुई अनुपम क्षमता है
सफल परिश्रम रहा आज मुझको लगता है
- पूर्णिमा वर्मन
१ फरवरी २०२६