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       तीन कुंडलिया

 

राजा छंदो का लगे, पिंगल का उपजात
आज करें मिलकर सभी, कुण्डलिया पर बात
कुण्डलिया पर बात, और यह दिवस मनाएँ
अनुशासन के साथ, छंद-से गुण अपनाएँ
'रीत' कहे हर ओर, बज रहा छांदस बाजा
दोहे का पा मुकुट, चले कुण्डलिया राजा

मन में अच्छी भावना, संयम रखता साथ
सोना बन जाता सभी, जिसे लगाता हाथ
जिसे लगाता हाथ, धरा-उपवन महकाता
अनुशासन के साथ, सफलता फल वह पाता
कहती ‘रीत’ यथार्थ, वही बढ़ता जीवन में
कर्म करे जो श्रेष्ठ भावना रखकर मन में

कहना था जो कह लिया, अब कुछ बचा न शेष
अब कब रही शिकायतें, न मनुहार ही लेश
न मनुहार ही लेश, पराया अपना कैसा
सीख रहे व्यवहार, आज जैसे को तैसा
पर क्या सच में 'रीत', सरल है ऐसे रहना
सब कुछ सहना और, पलटकर कुछ मत कहना

- परमजीत कौर 'रीत'
१ फरवरी २०२६

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