१
राजा छंदो का लगे, पिंगल का
उपजात
आज करें मिलकर सभी, कुण्डलिया पर बात
कुण्डलिया पर बात, और यह दिवस मनाएँ
अनुशासन के साथ, छंद-से गुण अपनाएँ
'रीत' कहे हर ओर, बज रहा छांदस बाजा
दोहे का पा मुकुट, चले कुण्डलिया राजा
२
मन में अच्छी भावना, संयम रखता
साथ
सोना बन जाता सभी, जिसे लगाता हाथ
जिसे लगाता हाथ, धरा-उपवन महकाता
अनुशासन के साथ, सफलता फल वह पाता
कहती ‘रीत’ यथार्थ, वही बढ़ता जीवन में
कर्म करे जो श्रेष्ठ भावना रखकर मन में
३
कहना था जो कह लिया, अब कुछ बचा
न शेष
अब कब रही शिकायतें, न मनुहार ही लेश
न मनुहार ही लेश, पराया अपना कैसा
सीख रहे व्यवहार, आज जैसे को तैसा
पर क्या सच में 'रीत', सरल है ऐसे रहना
सब कुछ सहना और, पलटकर कुछ मत कहना
- परमजीत कौर 'रीत'
१ फरवरी २०२६