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       तीन कुंडलिया

 


मानव
मानव करता भूल है, जाने या अनजान
गलती कर जो सीखता, वो ही है गुण खान
वो ही है गुण खान, करे जो उत्तम करनी
माने निज की भूल, कमी की करता भरनी
सुनो कुसुम की बात, बनो मन के तुम आनव
मंथन करे विवेक, सजग हो प्रतिपल मानव


भावुक मन
कैसी बेड़ी में फँसा, भावुक मन अनजान
अविनाशी ये जीव है, मानो अरे सुजान
मानो अरे सुजान, परख लो करनी अपनी
छोड़ सकल सब राग, ब्रह्म की माला जपनी
'कुसुम' भावना शुद्ध, रहे पावन बस ऐसी
मुक्त रहें हर प्राण, पाँव में बेड़ी कैसी


जीवन
जीवन तो संघर्ष है, चलते रहो सुजान
जो लड़ता है वीर सम, उसकी रहती आन‌‌
उसकी रहती आन, सदा आगे ही बढ़ता
हिम्मत जिसके साथ, वही चोटी पर चढ़ता‌‌
कहे कुसुम सुन बात, मूल की दृढ़ हो सीवन
उर में ऊँची सोच, सदा हिम्मत ही जीवन

- कुसुम कोठारी 'प्रज्ञा'
१ फरवरी २०२६

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