अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       गाँव - तीन चित्र

 


नदियाँ बहती दूध की, आज शहर की ओर
दूध गाँव से बेचता, अपना नंदकिशोर
अपना नंदकिशोर, बेचकर दारू पीता
घंटे वह चौबीस, उसी में जीवन जीता
ढहे पुरातन मूल्य, सँभाले बीती सदियाँ
गाँव पिये अब चाय, दूध की बेचे नदियाँ


सारा कुनबा साथ है, रहता अपने गाँव
घर-आँगन अच्छा बड़ा, है पेड़ों की छाँव
है पेड़ों की छाँव, घनी शीतल हरियाली
महके हरसिंगार, उठाता देकर ताली
लगता दीपक रोज, हँसे तुलसी का क्यारा
बिल्व पत्र का पेड़, लुटाए आशिष सारा


साफा पगड़ी धोतियाँ, रहा न इनका साथ
लाल छींट की लूगड़ी, अब हो गई अनाथ
अब हो गई अनाथ, आधुनिक है पहनावा
राम - राम है बंद, हलो करता है धावा
बनने में अँगरेज, दिख रहा अधिक मुनाफा
क्यों धारें वे आज, धोतियाँ पगड़ी साफा

- कुँवर उदय सिंह 'अनुज'
१ फरवरी २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter