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गाँव - तीन चित्र |
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१
नदियाँ बहती दूध की, आज शहर की ओर
दूध गाँव से बेचता, अपना नंदकिशोर
अपना नंदकिशोर, बेचकर दारू पीता
घंटे वह चौबीस, उसी में जीवन जीता
ढहे पुरातन मूल्य, सँभाले बीती सदियाँ
गाँव पिये अब चाय, दूध की बेचे नदियाँ
२
सारा कुनबा साथ है, रहता अपने गाँव
घर-आँगन अच्छा बड़ा, है पेड़ों की छाँव
है पेड़ों की छाँव, घनी शीतल हरियाली
महके हरसिंगार, उठाता देकर ताली
लगता दीपक रोज, हँसे तुलसी का क्यारा
बिल्व पत्र का पेड़, लुटाए आशिष सारा
३
साफा पगड़ी धोतियाँ, रहा न इनका साथ
लाल छींट की लूगड़ी, अब हो गई अनाथ
अब हो गई अनाथ, आधुनिक है पहनावा
राम - राम है बंद, हलो करता है धावा
बनने में अँगरेज, दिख रहा अधिक मुनाफा
क्यों धारें वे आज, धोतियाँ पगड़ी साफा
- कुँवर उदय सिंह 'अनुज'
१ फरवरी २०२६ |
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