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       तीन कुंडलिया

 


जग का मेला
जग का मेला छोड़कर, चला अकेला जीव
उसका भी छूटे यहीं, योद्धा जो उद्ग्रीव
योद्धा जो उद्ग्रीव, यहीं वैभव सब रहता
छोटा सा यह बिंदु, सिंधु में मिलकर बहता
'सखी' बढ़ाये आज, परम की राहों में पग
अंक हुये सब शून्य, तजा जब जगमग यह जग


साँझे चूल्हे
साँझे चूल्हे की पकी, रोटी में मृदु स्वाद
थोड़े को पूरा करे, आपस का संवाद
आपस का संंवाद, न टिकने दुख को देता
खुशियों का अनुनाद, बने सौभाग्य प्रणेता
क्या सोनी क्या हीर, पकड़ते कड़छुल राँझे
काली पड़ती पीर, जलें जब चूल्हे साँझे


कुर्सी
कुर्सी के आगे झुके, बैठे घुटने टेक
ठकुरसुहाती से भली, विधा न कोई नेक
विधा न कोई नेक, प्रिया सम कुर्सी खाली
ज्यों सुघरी सी नार, सुनयना वह मतवाली
मरे सभी सिद्धांत, हुई अब मातमपुर्सी
'सखी' दीन ईमान, सभी कुछ है ये कुर्सी

- कविता काव्या सखी
१ फरवरी २०२६

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