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       तीन कुंडलिया

 


कुंडलिया दिवस
शुभ कुंडलिया दिवस हम, मना रहे हैं आज
दोहा रोला से बने, मनहर छंद विराज
मनहर छंद विराज, सभी का मन अति मोहे
लय गति सुंदर भाव, छंद साहित्यिक सोहे
गिरिधर राय प्रणीत, छंद की बहुत खूबियाँ
हो प्रचलित यह छंद, मनाते दिन कुंडलिया


समाज
कैसी उन्नति कर रहा, देखो आज समाज
स्वार्थ नींव पर बन रहे रिश्ते नाते आज
रिश्ते नाते आज, बुजुर्ग हो रहे बेघर
संतानों के भाव, दिखाते हैं वे तेवर
जिनको किया समर्थ, , कर रहे उनकी दुर्गति
वृद्धाश्रम में भेज, कहो यह कैसी उन्नति


बेटा-बेटी
बेटा बेटी एक से, उनमें करें न भेद
अवसर प्यार समान हों, एकतुल्य संवेद
एक तुल्य संवेद, बेटियाँ कम न किसी से
कर्मशील सामर्थ्य, जीत लें बराबरी से
करें न कोई भूल, समझ कर उसे न चेटी
कन्या होती पूज्य, एक से बेटा बेटी

- ज्योतिर्मयी पंत
१ फरवरी २०२६

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