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       जीभ- तीन भाव

 


कर दे सबको आलसी, जमे रहें बत्तीस
दाँत काटकर जीभ को, झाड़ें अपनी खीस
झाड़ें अपनी खीस, जीभ में धीरज इतना
यह भी जानें दाँत, प्रेम वह करती कितना
चखती पहले स्वाद, बाद दाँतों को भर दे
निगले फिर वह साफ, सभी दाँतों को कर दे


कटती दाँतों से रही, जिह्वा कितनी बार
लड़ते फिर भी संग में, करते सब व्यवहार
करते सब व्यवहार, स्वाद भी सँग-सँग चखते
मगरमच्छ से बैर, नहीं पानी में रखते
एक अकेली कीर्ति, जीभ की कभी न घटती
दाँतों की बत्तीस, सोचते रात न कटती


दाँतों की इस भीड़ में, जीभ अकेली एक
शत्रु भले बत्तीस हों, नीयत रखनी नेक
नीयत रखनी नेक, एक दिन उन्हें बिछड़ना
टूटेंगे सब दाँत, अंत तक उन्हें पकड़ना
बनते हरदम ढाल, धनी वह भी बातों की
इसीलिये तो ध्यान, रखे वह भी दाँतों की

- डॉ. गोपाल कृष्ण भट्ट ‘आकुल’
१ फरवरी २०२६

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