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       दो कुंडलिया

 


नारी
नारी को सामान सा, समझे धूर्त समाज
वहाँ लक्ष्मी सरस्वती, शर्मिंदा हैं आज
शर्मिंदा हैं आज, हुआ नर स्वेच्छाचारी
बना स्वयं-भू श्रेष्ठ, नार से कर गद्दारी
'जीवन' कहे विचार, कपट के आगे हारी
कहता है इतिहास, छली हर युग में नारी


भेड़िये
भूखे वहशी भेड़िये, करने लगे तलाश
मिली अचानक सामने, सिंहासन की लाश
सिंहासन की लाश, देखकर सब ललचाये
बन कर आदमखोर, नोंचने सारे धाये
'जीवन' कहे विचार, स्रोत वैचारिक सूखे
करे परस्पर वार, भेड़िये सब यह भूखे

- भीमराव 'जीवन'
१ फरवरी २०२६

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