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       तीन कुंडलिया

 


धैर्य
आएँ संकट जब कभी, करें धैर्य से काम
निकलेगा हल भी यहाँ, सुबह नहीं तो शाम
सुबह नहीं तो शाम, मिटेंगे दुख ये सारे
डूबे उनकी नाव, सदा जो मन से हारे
कहता कवि 'वागीश', न जीवन में घबराएँ
कभी दुखों की रात, कभी सुख के दिन आएँ


अपने
अपनों से आनन्द है, घर हो या संसार
बिन अपनों के है नहीं, कोई भी आधार
कोई भी आधार, नहीं कुछ अच्छा लगता
अपने हों जब साथ, जगत बगिया-सा सजता
कहता कवि 'वागीश', कहाँ मिलता सपनों से
है सच्चा आनन्द, यहॉं केवल अपनों से


पीड़ा
बिन पीड़ा के है यहाँ, जरा बताओ कौन
कोई रोना रो रहा, कोई रहता मौन
कोई रहता मौन, हृदय में दुख हैं भारी
कौन जानता पीर, रही मतलब की यारी
देख रहा "वागीश", जगत की अद्भुत क्रीड़ा
हो क्यों रहा अधीर, नहीं कोई बिन पीड़ा

- बलबीर सिंह वर्मा 'वागीश'
१ फरवरी २०२६

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