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       दो कुंडलिया

 


दुष्टों का साम्राज्य
होता जब अपमान है, घायल हैं जज़्बात
अब कैसी आशा करें, ऐसे हैं हालात
ऐसे हैं हालात, भावना मरती जाती
और यहाँ पर डाह, मेल-मिलाप है खाती
दुष्टों का साम्राज्य, आदमी झर-झर रोता
जो जितना चालाक, सफल उतना ही होता


माया के फेर
माया का है फेर सब, लोग रहे हैं नाच
लक्ष्मी होती चंचला, है इंसान पिशाच
है इंसान पिशाच, लोग मानवता भूले
पैसों का है लोभ, ज्ञान से वे हैं लूले
मौसम में है धूल, धुआँ, अंधकार छाया
धनवानों के ठाठ, यहाँ दिखलाती माया

- अविनाश ब्यौहार
१ फरवरी २०२६

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