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          बहुत कोहरा है

तुम नहीं जाना सड़क पर
बहुत कोहरा है

कान सबके बन्द हैं
सुनते नहीं हैं स्वर
और मुँह में ठंढ से
हैं जम गये अक्षर
हो रहीं धुँधली दिशाएँ
आज सिहरा है

तुम पहन कर फटा स्वेटर
यदि गये बाहर
देह काँपेगी अकेली
है फटी चादर
पीर देती है कचोके
दर्द गहरा है

प्रश्न की परछाइयाँ
अब भी अनोखी हैं
आस की तनहाइयाँ भी
खूब चोखी हैं
क़ैद सपने आँसुओं का
कड़ा पहरा है

- डॉ. रंजना वर्मा
१ दिसंबर २०२१
     

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