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          ये कुहरे की शाम

तनमन, हाड़
कँपाने वाली
ये कुहरे की शाम निराली

दृष्टिहीन हो गये दृश्य सब
लगे सामने वृक्ष प्रेत तब
दिनकर भी लापता हो गया
चाँद निकलता ऐसे में कब
वाहन यों मंथर गति चलते
ज्यों नदिया में
श्वेत मराली

एकाकार हुआ जाता अब
धरती-गगन और सागर तल
यूँ तो पंछी नहीं भ्रमित हैं‌
उन्हें ज्ञात कुदरत की हलचल
लौट घोंसले में वे आते
लादे सपने कई सवाली

धूसर वर्तुल नागों जैसी
सड़कें भाग रहीं हैं सरपट
सभी इंद्रियाँ शिथिल हुई हैं
अब तो मन कुछ माँगे चटपट
मगर हाय! दुर्भाग्य हमारा
हर ठेले ने चाल बढ़ा ली

- डॉ मंजु लता श्रीवास्तव

१ दिसंबर २०२१
     

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