अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

     

          ये कुहरे की शाम

तनमन, हाड़
कँपाने वाली
ये कुहरे की शाम निराली

दृष्टिहीन हो गये दृश्य सब
लगे सामने वृक्ष प्रेत तब
दिनकर भी लापता हो गया
चाँद निकलता ऐसे में कब
वाहन यों मंथर गति चलते
ज्यों नदिया में
श्वेत मराली

एकाकार हुआ जाता अब
धरती-गगन और सागर तल
यूँ तो पंछी नहीं भ्रमित हैं‌
उन्हें ज्ञात कुदरत की हलचल
लौट घोंसले में वे आते
लादे सपने कई सवाली

धूसर वर्तुल नागों जैसी
सड़कें भाग रहीं हैं सरपट
सभी इंद्रियाँ शिथिल हुई हैं
अब तो मन कुछ माँगे चटपट
मगर हाय! दुर्भाग्य हमारा
हर ठेले ने चाल बढ़ा ली

- डॉ मंजु लता श्रीवास्तव

१ दिसंबर २०२१
     

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter