अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

     

          जलते हुए अलाव

सड़कों पर सन्नाटा ठिठुरा गूँगा शोर
कोहरे की चादर ओढ़े -
है गुमसुम भोर

जलते हुए अलाव काँपते बैठे लोग
चिपटे बैठे हुए तापते - ऐंठे लोग
भूलभाल कर सभी अदावत बस घर में
गर्म रजाई में हैं घुसे-
दरोगा चोर

तीर हवा है और शीत के चांटे हैं
मौसम सारा घायल करते काँटे हैं
भूख लगी है लेकिन बड़ी मुसीबत है
कौन हाथ बाहर ला करके -
खाये कौर‌‌

गर्म चाय से खुद को आग लगाते लोग
आ जा धूप सुनहरी राग लगाते लोग‌
सुबह सबेरे रामनाम की धुन जपते
थर दर बजते दाँतों के -
जारी हैं दौर

- कॄष्ण भारतीय
१ दिसंबर २०२१

     

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter