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          देखिये कुहासा है

छुप रहा आँख से सवेरा है
दूर तक देखिये कुहासा है

हाथ को हाथ तक नहीं सूझे
धुंध का भी बड़ा तमाशा है

सब नज़ारे छुपे ढके से है
आज कुहरा गज़ब का छाया है
 
देख नीहार तो लगे जैसे
बादलों को उतार लाया है

कोहरे की सफेद चादर में
गुम हुआ ये जहान सारा है

कोहरा राज छुपाए है कुछ
चीज़ मशकूक कुछ ज़ियादा है

जब गज़ल कोहरे की होती है
हर 'अमित' शेर भीग जाता है

- अमित खरे
१ दिसंबर २०२१
     

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