अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

आस्ट्रेलिया से कवि सम्मेलन  


 

 

 

प्रेम के पल को

प्रेम के पल को करें हम आज
यह जीवन समर्पण
यह घड़ी है याद की संवेदना की
गर्व की उल्लास की कुछ वेदना की
हर्ष के उत्कर्ष के भी बीच
क्यों आज क्रंदन
प्रेम के पल को करें हम आज
यह जीवन समर्पण

आँसुओं ने प्रेम की माला पिरोई
शांति से बढ़कर नहीं है चीज़ कोई
आओ मिलकर हम करें संकल्प
हो ये विष रहित मन
प्रेम के पल को करें हम आज
यह जीवन समर्पण

भाइयों में वैर का व्यवहार ना हो
मन वतन के बीच में दीवार ना हो
शांति के पथ पर शपथ ले आज
मन हो जाए चंदन
प्रेम के पल को करें हम आज
यह जीवन समर्पण

— अनिल वर्मा
तेरे फ़िराक़ में

तेरे फिराक में यों सुबह शाम होती है
हर एक शाम बमुश्किल तमाम होती है
के जिस अदा ने सरेआम मुझको लूटा था
वही अदा अब रक़ीबों के नाम होती है।

उदास पंछी को पिंजरे में किसलिए सैय्याद
जो दिल का करते हैं सौदा वो भी तो कैद होती है
तसव्वुरात के सहरा में कुरबतों के सराब
इसी ही लरज़ां हकीकत में शाम होती है

इंतहा है ये रज़ा इश्क में मुहोब्बत की
शमा की आग में जलता है पहले परवाना
उसी ही आग में शमा भी तमाम होती है

—रज़ा किरमानी

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter