अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ज्योति पर्व
संकलन

 

दीप जलाना

दीवाली की महिमा का,
अँधियारे में गरिमा का,
आशा का दीप जलाना,
दूजे को राह दिखाना।

अपनी कमियों पर ऐंठे
दूजों की हँसी उड़ाते,
दुर्गंध कहाँ से जाए
जब आत्मसात मैलापन।

उनसे तो वे निर्मल हैं
मानवता जहाँ धरम है
धर्मों की निंदा करना
वह निंदनीय जीवन है।

सीमा में बँधा न दीपक
आँधी से बुझा न दीपक
हृदय से जिसे जलाया
वह अमर प्रेम है दीपक।

दीवाली तुम्हें मुबारक
जन जन में खुशी भरी हो।
नयनों में सजल नदी हो
जीवन रसमय गगरी हो।

जग में अब युद्ध नहीं हो
जन-जन मे शांति फैले।
विश्वास का दीप जलाना
जग की बगिया महकाना।।

-सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक'

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter