अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ज्योति पर्व
संकलन

एक और दिवाली

रीति रिवाज़ों के एक साल ने
फिर करवट बदली है
जाऊँ बाज़ार से
कुछ दीए ख़रीद लाऊँ
ढूँढू कहाँ पड़ीं हैं
पिछले साल की बची फुलझड़ियाँ
याद है मुझे बचपन की दिवाली
जब अनार जलाते ही
रोशनी के फ़व्वारे
मन में फूट पड़ते थे
तब हम सचमुच बच्चे थे।

गुज़रा वक्त
जलती चकरी की तरह
जब उल्टा घूमता है
तो यादों का धुआँ
हवा में फैल जाता है
अतीत में गूँजता है एक धमाका
कहीं किसी ने फूँकी थी चिंगारी
और आग आज तक नहीं बुझी।

सोचता हूँ
दरवाज़े पे सजाऊँगा रंगोली
और किस्मत की तरह रंग बदलती
जलती बुझती बत्तियाँ
अंधेरे में रोशनी के लिए
पोछूँगा धूल
पुराने रिश्तों पर से
और भेजूँगा कुछ कार्ड
बिना खत के।

बहुत दिन बीत गए
दिवाली मनाते
बहुत दिन बाद
फिर आई है दिवाली।

-शलभ श्रीवास्तव

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter