अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

ज्योति पर्व
संकलन

 

मंदिर दियना बार

मंदिर दियना बार सखी री
मंदिर दियना बार!
बिनु प्रकाश घट घट सूनापन
सूझे कहीं न द्वार!

कौन गहे गलबहियाँ सजनी
कौन बँटाए पीर
कब तक ढोऊँ अधजल घट यह
रह-रह छलके नीर
झंझा अमित अपार सखी री
आँचल ओट सम्हार

चक्रों पर कर्मो के बंधन
स्थिर रहे न धीर
तीन द्वीप और सात समंदर
दुनियाँ बाजीगीर
जर्जर मन पतवार सखी री
भव का आर न पार!

अगम अगोचर प्रिय की नगरी
स्वयम प्रकाशित कर यह गगरी
दिशा-दिशा उत्सव का मंगल
दीपावलि छायी है सगरी
छुटे चैतन्य अनार सखी री
फैला जग उजियार!

- पूर्णिमा वर्मन

  

दीपक मेरे मैं दीपों की

दीपक मेरे मैं दीपों की
सिंदूरी किरणों में डूबे
दीपक मेरे
मैं दीपों की!

इनमें मेरा स्नेह भरा है
इनमें मन का गीत ढरा है
इन्हें न बुझने देना प्रियतम
दीपक मेरे मैं दीपों की!

इनमें मेरी आशा चमकी
प्राणों की अभिलाषा चमकी
हैं ये मन के मोती मेरे
मैं हूँ इन गीले सीपों की

इनको कितना प्यार करूँ मैं
कैसे इनका रूप धरूँ मैं
रतनरी छाँहों में डूबे
दीपक मेरे मैं दीपों की

-रामेश्वर शुक्ल अंचल

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter