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       इस अग-जग के सभी झमेले

 
इस अग-जग के सभी झमेले
कृष्ण कन्हैया तुमने झेले

लूटा माखन, मटकी फोड़ी
बनी राधिका के संग जोड़ी
गौएँ-ग्वालों संग चराईं
गोकुल की गलियों में खेले

बंसी यमुना-तीर बजाई
गोकुल में जा पड़ी सुनाई
मुस्काई फिर धवल चंद्रिका
अद्भुत रास-नृत्य के मेले

चुरा लिए उर चुपके-चुपके
चढ़े कदंब-डार पर छुप के
खेले खेल गोपियों के संग
वस्त्र-हरण के ढंग अलबेले

अत्याचारी राक्षस मारे
नराधमों के शीश उतारे
कुचल दिए ज़हरीले विषधर
क्रूर कंस से लड़े अकेले

पाँव धकेले हर अधर्म के
पाठ उजेले दिए कर्म के
मोह त्याग, अधिकार छोड़ मत
कहा पार्थ गांडीव भले ले

अजर आत्मा, तन नश्वर है
अंतर में सबके ईश्वर है
पाँचजन्य हुंकार, सुदर्शन
जगती शक्ति पुनः तुमसे ले

- प्रो. विशंभर शुक्ल
१ सितंबर २०२६

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