अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       एक बार कान्हा, फिर आओ

 
नई अलौकिक मधुर प्रेम की, जन-मानस में ज्योति जलाओ
भारत की पावन धरती पर, एक बार
कान्हा, फिर आओ

स्वार्थलिप्त हैं सारे प्राणी हुए किनारे रिश्ते-नाते
पलभर भी अब दशा-दिशा पर व्यक्ति नहीं चिंतन कर पाते
अहम भाव की आग बुझाकर, हे प्रभु! मानवता पनपाओ
एक बार कान्हा, फिर आओ

दौड़ रहे सब आँख मूँदकर भौतिकता में मन उलझाए
अपसंस्कृति से बढ़ा चाव है अपनी संस्कृति समझ न पाए
भ्रमित हुए जो चकाचौंध से, उन्हें शीघ्र सत्पथ पर लाओ
एक बार कान्हा, फिर आओ

आए दिन सर्वत्र धरा पर संकट गहराता जाता है
आगे क्या-क्या होगा जग में यही प्रश्न मन में आता है
हे लीलाधर कृष्ण मुरारी! बढ़ी आसुरी वृत्ति मिटाओ
एक बार कान्हा, फिर आओ

सभी शान्ति से रहें विश्व में बढ़े परस्पर भाईचारा
बहे सदा निर्बाध रूप से उचित दिशा में युग की धारा
हे योगेश्वर ! आज सभी को , गीता का संदेश बताओ
एक बार कान्हा, फिर आओ

सुन लेना करबद्ध विनय यह राधावल्लभ! हे गिरिधारी!
पल-पल हमें डराने वाली दूर हो सके विपदा भारी
पुनः सुनाकर वंशी की धुन, आनंदित सबको कर जाओ
एक बार कान्हा, फिर आओ

- डॉ० विष्णु शास्त्री 'सरल'
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter