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       मेरे कान्हा मेरे मोहन

 
मेरे कान्हा मेरे मोहन सदा मुरली बजाते हैं
थिरकते प्रेम की धुन में, रास ऐसा रचाते हैं

नहीं मैं जानती कृष्णा, करूँ क्या मैं तुम्हें अर्पण
छिपे हैं भाव जो दिल में, लो करती हूँ मैं समर्पण
मैं करती हूँ प्रभु विनती, उसे स्वीकार भी कर लो
तेरी सूरत ही अब देखूँ, निहारूँ जब कभी दर्पण
मनोहर मुख, नयन काले भाव मन में जगाते हैं
मेरे कान्हा मेरे मोहन सदा मुरली बजाते हैं

मैं जग की रीत क्या जानूँ, मैं कोई प्रीत न जानूँ
मेरे जीवन-खेवैया तुम, कन्हैया बस तुम्हें मानूँ
दरश दे दो मुझे कान्हा कि मेरा मन हुआ व्याकुल
कि अँखियाँ भीग न जाएँ, तेरी मूरत ही बस ठानूँ
ग्वाल-गोपी सभी मिलकर धेनु वन में चराते हैं
मेरे कान्हा मेरे मोहन सदा मुरली बजाते हैं

डगर जीवन की है मुश्किल, पार इसको लगा देना
सारथी बन के कान्हा तुम सोई किस्मत जगा देना
करूँ आराधना तेरी, करूँ मैं श्री चरण-वंदन
पधारो श्याम-सुंदर तुम, द्वंद्व मन के भगा देना
धर्म का ज्ञान शुभ देकर मधुर गीता सुनाते हैं
मेरे कान्हा मेरे मोहन सदा मुरली बजाते हैं

- वंदना नामदेव
१ सितंबर २०२६

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