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       बजा दो वंशी किसन

 
दे दो जीवन को कुछ और नए क्षण
फिर से वह वंशी बजा दो किसन

छलका दो अमृत-रस
राग भरी धुन
जग जाएँ सब
लिए मीठी सुनगुन
रंग दो अब प्रेम-रंग से अखिल भुवन

पुष्पित हों बाग, हरित
रंग भरे वन
मधुर रस भरा हो
वह तेरा मधुवन
खिलें सुमन, बहे नयी गंध, नव पवन

हो फिर से कालिंदी-
तट पर हलचल
घट भरने आएँ
फिर गोपियाँ सदल
करे जरा राधा की पायल रुनझुन

दे दो अब गीता का
फिर से वह ज्ञान
पढ़ा मगर हमने
न दिया कभी ध्यान
घिरे नहीं कौरव से अपना अब रण

बची रहे कीर्ति देश-
धर्म की चलन
टूटें सब अंध-जाल
औ मति-भरम
गाएँ सब जन-गण-मन, वंदे मातरम

- उदय शंकर सिंह 'उदय'
१ सितंबर २०२६

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