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       अंधियारे में अंकुर

 
भादों के भीगे मौसम में
पहरों की दीवार हिली
अंधियारे में अंकुर फूटा
कृष्ण-जन्म की कली खिली

सन्नाटे की सांकल टूटी
पहरेदारों की सुध गुम
कंस-दुष्ट के कारागृह में
बूँदों की मद्धम रिमझिम
पगडंडी से उतरी यमुना
चरण चूमने को आतुर
शून्य शहर के वीराने में
जागा कोई भाव मधुर
कठिन लोह-शृंखला पिघली
पर जननी को पीर मिली
अंधियारे में अंकुर फूटा
कृष्ण-जन्म की कली खिली

गली-मुहल्ले ढोलक गूँजी
भीगे छप्पर छनती धूप
संशय के इस महासमर में
उतरा एक अलौकिक रूप
माटी के मटकी-सपनों पर
माखन-सा सुख लिपट रहा
थके पाँव के छाले हँसते
मन का संशय निपट रहा
अधरों पर बंसी की धड़कन
मटमैली हर देह धुली
अंधियारे में अंकुर फूटा
कृष्ण-जन्म की कली खिली

भीड़ भरी इस अंध-सदी में
मन का अर्जुन बहुत उदास
भरी विषमता हर कोने में
टूट रहा भीतर विश्वास
कर्म-योग की पावन पाती
फिर से कोई बाँच रहा
खंडित मन के सूने पथ पर
नव-आशा को जाँच रहा
कृष्ण-जन्म की पावन पाती
नव-उम्मीदों संग खुली
अंधियारे में अंकुर फूटा
कृष्ण-जन्म की कली खिली

- सुशील शर्मा
१ सितंबर २०२६

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