अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       बोले कान्हा

 
जाते-जाते बोले कान्हा
राधा जी के कान में
कर्मपंथ पर जाना होगा
जन-जन के सम्मान में

वचन ले लिया राधा से यह
आँसू नहीं बहाओगी
वृंदावन को छोड़ कभी भी
तुम मथुरा न जाओगी
आँसू गिरे अगर भू पर तो
मैं विचलित हो जाऊँगा -
याद करोगी तो पाओगी
मुझको सकल जहान में

रोने का अधिकार जो छीना
अँखियाँ ऐसी पथराईं
भारी मन से विदा हुए तो
राधा देख नहीं पाई
अनहद प्रेम छीन न पाए
राधा से घनश्याम भी
पत्ता तड़पा, डाली रोई
कान्हा जी के ध्यान में

सदा उदासी को ही ओढ़ा
व्याकुलता की ओट में
राधा हुई विरह में पागल
कान्हा की यों चोट में
अंतिम पल तक वचन निभाकर
बंशी की धुन में खोई
वृंदावन की गलियाँ गूँजें
राधा-गोविंद गान में

- सुरेंद्र कुमार शर्मा
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter