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       बोले कान्हा

 
जाते-जाते बोले कान्हा
राधा जी के कान में
कर्मपंथ पर जाना होगा
जन-जन के सम्मान में

वचन ले लिया राधा से यह
आँसू नहीं बहाओगी
वृंदावन को छोड़ कभी भी
तुम मथुरा न जाओगी
आँसू गिरे अगर भू पर तो
मैं विचलित हो जाऊँगा -
याद करोगी तो पाओगी
मुझको सकल जहान में

रोने का अधिकार जो छीना
अँखियाँ ऐसी पथराईं
भारी मन से विदा हुए तो
राधा देख नहीं पाई
अनहद प्रेम छीन न पाए
राधा से घनश्याम भी
पत्ता तड़पा, डाली रोई
कान्हा जी के ध्यान में

सदा उदासी को ही ओढ़ा
व्याकुलता की ओट में
राधा हुई विरह में पागल
कान्हा की यों चोट में
अंतिम पल तक वचन निभाकर
बंशी की धुन में खोई
वृंदावन की गलियाँ गूँजें
राधा-गोविंद गान में

- सुरेंद्र कुमार शर्मा
१ सितंबर २०२६

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