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       आ जाओ फिर से

 
राधा की अधजल गगरी को
पग-पग पर छलकाने वाले
हे श्याम सलोने नटनागर!
बुला रहे सब होकर कातर
एक बार आ जाओ फिर से
वृंदावन की मधुर धरा पर

कैसा है कालिंदी का तट?
कहाँ गया प्यारा वंशीवट?
जहाँ कभी था रास रचाया
गोप-गोपियों के संग गाया
गोकुल देखो, देखो मथुरा
घूम-घूम देखो ब्रज सारा
देखो वन-उपवन सब देखो
होकर खूब मगन मन देखो
नहीं दिखेगा तुम्हें कहीं पर
द्वापर वाला भारत प्यारा

गाएँ यहाँ रंभाती केवल
नहीं दूध की नदियाँ बहती
हरियाली का अंत हो गया
करुण-कथा कालिंदी कहती
तुमने जहाँ मटकियाँ फोड़ीं
बरजोरी भी क्या की थोड़ी!
ग्वालिनियों को खूब सताया
वंशी की धुन बड़ी निगोड़ी
देख सकोगे क्या इन सबको?
खत्म हुआ है क़िस्सा सारा

परिवर्तन प्रकृति की माया
जान रहे हो कान्हा प्यारे
सदियों-बरस पुरानी बातें
धरी रह गईं किसी किनारे
बदल गया युग, कृष्ण कन्हैया
भूल गए सब ता-ता थैया
आकर चक्र चलाओ ऐसा
पार लगे भारत की नैया
ऐसा शुभ दिन कब आएगा
सोच रहा है मन बेचारा

- श्रीधर आचार्य 'शील'
१ सितंबर २०२६

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