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       मीत सुदामा

 
मथुरा आए मीत सुदामा
गद्गद् कान्हा दौड़े आए
गले लगाए मीत सुदामा

आँखों से बरसे जलधारा
अधरों पे मुस्कान सजे
मौन हुई शब्दों की वाणी
साँसों में सुर-ताल बजे
भर बाँहों में रोए कान्हा
अचरज में थे मीत सुदामा

झीनी धोती, धूसरित पाँव
देख के कान्हा अकुलाए
भूल गए सब राज-पाठ वह
राजमहल तक ले आए
प्रेम सहित सौंपा सिंहासन
सकुचाए से मीत सुदामा

भर-भर मुट्ठी चाव से खाए
कच्चे चावल भेंट मिली
बालसखा खिल-खिल कर हँसते
यूँ मिस्री की डली घुली
बचपन की घड़ियाँ अनमोल
याद दिलाएँ मीत सुदामा

- शशि पाधा
१ सितंबर २०२६

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