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       आओ कान्हा, फिर से आओ

 
सूनी-सूनी मन की गलियाँ फिर से आज सजाएँ
माखन जैसी मीठी बोली घर-घर कृष्ण सुनाएँ
मुरली की वह तान सुनाकर मन के द्वार जगाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

यमुना मैली, मैला मन है मैला हुआ उजाला
नफ़रत के विषधर फन काढ़े हर ओर विषम ज्वाला
प्रेम-सुधा की धार बहाकर धरती को नहलाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

बच्चों की आँखों में सपने बूढ़ों में विश्वास
भटके युवा तलाश रहे हैं जीवन का आकाश
गीता का संदेश सुनाकर कर्म-पथ पर लाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

टूट रहे हैं रिश्ते सारे स्वार्थ हुआ सिरमौर
अपने ही अपनों से रूठे मन में उठता शोर
राधा जैसा प्रेम जगाकर मन का दर्द मिटाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

अंधियारे के बीच कन्हैया दीप बनो विश्वास
भारत की इस पुण्य धरा पर फिर गूँजे उल्लास
धर्म नहीं मानवता का तुम नूतन पर्व मनाओ
आओ कान्हा फिर से आओ

- संजय सुजय बासल
१ सितंबर २०२६

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