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       कृष्णा

 
खुल द्वार गए बंदीघर के
और जंगी खुले किवाड़
न देर लगी

सो गए हैं सारे रखवाले
सो गए सब पहरेवाले
कमल-पात से राजपुत्र का
करते रहे वे दुलार
न देर लगी

काली-काली अंधियारी थी
रैन अष्टमी मतवाली थी
वासुदेव ले चले कृष्ण को
कालिंदी के उस पार
न देर लगी

जल घुटनों बढ़ आया है
काली रात की छाया है
देवकी-सुत अब राधा के
और यशोदा के हैं लाल
न देर लगी

भाग्य खुले अब तो घर-आँगन
स्वागत-स्वागत है, वंदन
मोहन गोकुल में आए
बन करके वे नंदलाल
न देर लगी

वह यमुना-जल था ज़हरीला
ग्वालों का मन-मुख नीला
कान्हा ने पल में कालिय को
नाथा, हर ब्रज-संताप
न देर लगी

- रंजना गुप्ता
१ सितंबर २०२६

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