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       अब तो आओ

 
अब तो आओ नाग नथैया
ज़हर भर गया यमुना जल में
विषधर खड़े हुए काढ़े फन
आँखें सूनी, गलियाँ सूनी
सूना-सूना है वृंदावन
ढूँढ़ रही है
राधा इत-उत
रंभा रहे हैं बछड़े-गैया

हुईं विषमतम स्थितियाँ हैं
दिखता कोई नहीं किनारा
हुआ अधीर और उन्मन मन
थकित हो रहा चिंतन सारा
कर न सके
आँसू की व्याख्या
ज्ञान दे रहे उद्धव भैया

- मधु प्रधान
१ सितंबर २०२६

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