अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       कृष्ण मैं मंदिर तेरा

 
कृष्ण मैं मंदिर तेरा
आराधना अविराम है

गर्भगृह मेरे हृदय में
शीश गुंबद-सा तना
नेत्र बनते हैं कपाटें
भावों का उपवन घना
भक्तिमय हैं क्षण सभी
यह रात-दिन का काम है

गीत मेरे ग्वाल हैं
हर गीतिका है गोपिका
छंद तेरी बाँसुरी
अतुकांत में भी ब्रज दिखा
शब्द वृंदावन दिखाते
द्वारका हर शाम है

चेतना गीता बनी है
पार्थ-जिज्ञासा लगे
हर प्रतिज्ञा भीष्म लगती
राधिका उर में पगे
हैं चँवर साँसें डुलातीं
कर्म जपता नाम है

- कुमार गौरव अजीतेन्दु
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter