अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       कृष्ण कन्हैया

 
बजा रहा है मोर बाँसुरी
छप्पक छैया खेल रहे हैं
कृष्ण कन्हैया
बजा रहा है मोर बाँसुरी
नाचे गैया

भरी सड़क है उजड़ी-पुजड़ी
मित्रों की है भीड़ बड़ी
कोई फिसले, उछले कोई
हँसें गोपियाँ खड़ी-खड़ी
राधा रानी किए जा रहीं
ता-ता थैया

फूटा घुटना बलदाऊ का
रोएँ भल-भल आँखें मल
पानी झम-झम बरस चुका है
सड़कें तर हैं, गड्ढे गल
कान्हा-बलदाऊ को ढूँढ़ें
जसुदा मैया

सुन ले ओ इस जग के राजा
गड्ढा भर कर सड़क बना
वरना आते हर चुनाव में
चबवा देंगे नाक-चना
फिर न तुम बरखा देखोगे
ना पुरवैया

- जिज्ञासा सिंह
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter