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       नेह जान डोल डोल

 
नेह जान डोल-डोल, मातु को सुनाए बोल
लाल-चातुरी अमोल, प्रेम में नहाए है
मधुर मुखारबिंदु, छाछ-लपटाए इंदु,
करुणावतार सिंधु, सुधा को बहाए है
ग्वाल द्वार रहे झाँक, काँधन पे चढ़े ताक
आहट निहार आँक, नैनन सिहाए है
छीको को फोरि गोप, मातु देख भए लोप
कान्ह पे कसूर थोप, ईश ही सहाए है

मटकी को फोरि डरे, छाछ मुख मेलि धरे
मातु देखि परे-परे, नेह में लजाए हैं
श्याम-अंग मेघ घने, विद्युत-सी रेख जने
नैनन की दमक सने, बाँसुरी बजाए हैं
गोपी और ग्वाल-बाल, याचक के हाथ थाल
गौरस के मोह-जाल, लाज को तजाए हैं
अँचरा दबाए दंत, राधिका निहोर कंत
भक्त मुग्ध तरे संत, रूप जो सजाए हैं

- सुधा हलुवालिया
१ सितंबर २०२६

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