अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

       नेह जान डोल डोल

 
नेह जान डोल-डोल, मातु को सुनाए बोल
लाल-चातुरी अमोल, प्रेम में नहाए है
मधुर मुखारबिंदु, छाछ-लपटाए इंदु,
करुणावतार सिंधु, सुधा को बहाए है
ग्वाल द्वार रहे झाँक, काँधन पे चढ़े ताक
आहट निहार आँक, नैनन सिहाए है
छीको को फोरि गोप, मातु देख भए लोप
कान्ह पे कसूर थोप, ईश ही सहाए है

मटकी को फोरि डरे, छाछ मुख मेलि धरे
मातु देखि परे-परे, नेह में लजाए हैं
श्याम-अंग मेघ घने, विद्युत-सी रेख जने
नैनन की दमक सने, बाँसुरी बजाए हैं
गोपी और ग्वाल-बाल, याचक के हाथ थाल
गौरस के मोह-जाल, लाज को तजाए हैं
अँचरा दबाए दंत, राधिका निहोर कंत
भक्त मुग्ध तरे संत, रूप जो सजाए हैं

- सुधा हलुवालिया
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter