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       प्रगट हुए गोपाल

 
आह्लादित हैं देवगण, धरती हुई निहाल
हरसाने संसार को, प्रगट हुए गोपाल

दुष्टों के आतंक से, धरती थी लाचार
प्रगट भये गोपाल तो, झूम उठा संसार

कृष्ण-जन्म पर सज गए, मंदिर-कारागार
मनमोहक लगने लगा, यह सारा संसार

गोकुल के घर-घर उठा, नेह-स्नेह का शोर
मतवाली टोली लिए, आया माखनचोर

कान्हा छेड़ो तो ज़रा, प्रीत-पगा वह राग
समरसता जिससे बढ़े, सबमें हो अनुराग

गोकुल-मथुरा हो रहे, कितने भावविभोर
गली-गली में ढूँढ़ते, अपना माखनचोर

जिसके मन पर चढ़ गया, यहाँ श्याम का रंग
उसको कब भाए कभी, दुनिया के नवरंग

कर ली पूजा आपने, घूमे चारों धाम
भक्ति करें बिन स्वार्थ के, तभी मिलेंगे श्याम

मेरी तो थी ही नहीं, तेरी ही थी हार
की है जब भी अनसुनी, तूने मिरी पुकार

सूना वृंदावन पड़ा, मथुरा भी बदहाल
बंसी की धुन छेड़ दो, फिर आओ गोपाल

- सुबोध श्रीवास्तव’
१ सितंबर २०२६

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