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       कान्हा बसे मेरे नैनों में

 

जब कान्हा बसे मेरे नैनों में,
किसी और के ध्यान को मैं क्या करूँगी
चितचोर है माखनचोर बड़ा,
वह चैन चुराकर मैं क्या करूँगी
रस-माधुरी से तर है रसना,
किसी और को गाकर मैं क्या करूँगी
ब्रज की रज के सदके,
तज के कहीं और को जाकर मैं क्या करूँगी

प्रेम का गुलाल तूने मला मेरे गालों पे तो
शर्म से मैं लाल-लाल हो गई हूँ साँवरे!
वंशी की मधुर तान करती है भंग ध्यान
इसके सुरों में कैसी खो गई हूँ साँवरे!
प्रीत की जो पड़ी धूप, निखरा है मेरा रूप
कैसी मैं अनूप आज हो गई हूँ साँवरे!
बिना छुए कोई अंग, तेरे जैसा हुआ रंग
अपना मैं रंग सारा खो गई हूँ साँवरे

हाथ अबीर की झोरी लिए वृषभान-लली अब जाय रही है
कैसे रँगूँ मनमोहन को, यह जोड़-जुगाड़ लगाय रही है
गैल में श्याम से भेंट भई, सब भूलि के वो शरमाय रही है
श्याम ने मारि दई पिचकारी तो गैल खड़ी पछताय रही है

- डॉ. रश्मि कुलश्रेष्ठ
१ सितंबर २०२६

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