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       श्रीकृष्ण अवतार

 
पाप बढ़ें जब भी यहाँ, प्रभु लेते अवतार
कर अधर्म का नाश तब, करते भव-उद्धार

द्वापर युग में कृष्ण ने, लिया धरा में जन्म
भूल न पाए आज तक, सिखलाया जो धर्म

मथुरा पावन भूमि में, बंदीगृह अवतार
देवकी-सुत गोविंद हित, यसुमति पालनहार

महिमा शाश्वत प्रेम की, राधा रानी संग
दिखलाई श्रीकृष्ण ने, पावन प्रेम-प्रसंग

बालरूप में ही दिखा, लीलाओं का मर्म
मातु यशोदा, गोपियाँ, बिसरीं सब निज कर्म

ज्ञान दिया संसार को, दुख-सुख में समभाव
कर्म करें पर त्याग दें, फल-इच्छा का भाव

मित्र सुदामा की कथा, दिखलाती यह नीति
धन-दौलत बनती नहीं, प्रिय रिश्तों में भित्ति

अर्जुन को उपदेश जो, दिए कृष्ण महाराज
युगों-युगों के बाद भी, सदा सत्य हैं आज

निज धर्म, अधिकार का, होता बहुत महत्त्व
गीता के उपदेश हैं, सार्थक जीवन-तत्त्व

गिरिधर ग्वाल गोपाल जो, बने द्वारकाधीश
हुए चमत्कृत जीव सब, ऐसे प्रभु जगदीश

जन्मोत्सव सार्थक तभी, अपनाएँ उपदेश
मानव-जीवन के लिए, गीता-ज्ञान विशेष

- ज्योतिर्मयी पंत
१ सितंबर २०२६

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