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       उजले थे तब श्याम

 
सब अँधियारा हो गया, उजले थे तब श्याम
व्याकुल थीं माँ देवकी, सोच-सोच परिणाम

मथुरा से गोपाल जब, आए गोकुल गाँव
बीच मार्ग व्याकुल रही, जमुना छूने पाँव

घुटनियों चलते श्याम कर, मोरपंख शृंगार
देख यशोदा हर्ष से, भूलीं सब संसार

गोकुल-रज पावन हुई, पावन सारे धाम
ठुमक-ठुमक कर जब चले, कृष्ण और बलराम

पग-पैंजन कटि-करधनी, बजते थे जब मंद
सारा गोकुल-ग्राम तब, पाता था आनंद

धेनु लिए वन को गए, जब नटखट गोपाल
पहन पीत पगड़ी बने, टेसू सारे ग्वाल

नलकूबर-मणिग्रीव का, करना था उद्धार
दिखलाया बल कृष्ण ने, छुटपन अतुल अपार

नटखट लीलाएँ कई, कई असुर-संहार
बाल्यकाल में कृष्ण ने, किए बहुत उपकार

वृंदावन को आ गए, गोकुल तज गोपाल
गोकुल-वासी सब रहे, वहाँ सदा खुशहाल

- अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
१ सितंबर २०२६

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