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कन्हैया फिर चले आओ
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बढ़ा है पाप धरती पर, कन्हैया
फिर चले आओ
पड़ी विपदा बहुत भारी, करें क्या राह दिखलाओ
घिरी घनघोर काली सी, घटा जग में निराशा की
जला विश्वास का दीपक, किरण आशा की बिखराओ
अँधेरा ही अँधेरा है, नहीं सूझे कोई रस्ता
भँवर में फँस गई नैया, तुम्हीं अब पार लगवाओ
कदंब की डाल है सूनी, हैं सूनी कुंज की गलियाँ
सुरीली तान मुरली की, जरा फिर से सुना जाओ
नहीं यमुना है पहले सी, नहीं उल्लास पहले सा
मिटा कर द्वेष की छाया, प्रेम-रसधार बरसाओ
पड़ा है धर्म संकट में, हैं चलते चाल शकुनी भी
लगी है दाँव पर नारी, प्रभु उलझन ये सुलझाओ
नहीं है प्रेम रिश्तों में, नहीं विश्वास थोड़ा भी
सुनाकर ज्ञान गीता का, जगत का सार समझाओ
- रमा प्रवीर वर्मा
१ सितंबर २०२६ |
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