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       हे मुरारी कृष्ण मधुकर
 

 
हे मुरारी कृष्ण मधुकर, फिर धरा पर आइए
पुण्य-भूमि वसुंधरा यह, पुष्प-सा महकाइए

है बड़ा घनघोर कलि-युग, तम यहाँ गहरा घना
इस जहाँ में अवतरण लें, फिर वही युग लाइए

पथ-भ्रमित सभी जीव हैं और विकल जीवात्मा
ज्ञान की वही दिव्य ज्योति, फिर यहाँ फैलाइए

हर्ष-पूरित हों हृदय सब, शोक-सागर से परे
रख अधर मुरली मनोहर, फिर वो धुन सुनाइए

धर्म की स्थापना हो, पापियों का नाश हो
जगद्गुरु भारत बन जाए, सारथी बन जाइए

मोह के बंधन कटें सब, पार भवसागर करें
आपकी करुणा भरा जल, विश्व पर बरसाइए

- प्रगति शंकर
१ सितंबर २०२६

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