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       जानते हो तुम सभी कान्हा

 
किसी के मन में क्या है, जानते हो तुम सभी कान्हा
तुम्हारे ही भरोसे है हमारी ज़िंदगी कान्हा

चली आएगी जीवन में हमारे हर खुशी कान्हा
सुनाओ फिर से आकर प्यार की तुम बाँसुरी कान्हा

सखा तंदुल की मुट्ठी को बदल देती जो महलों में
ज़माने में कहाँ मिलती है अब वो दोस्ती कान्हा

न राधा रुक्मिणी मीरा, नहीं मैं गोपिका होऊँ
तुम्हारे जो चरण धोए, बनूँ मैं वो नदी कान्हा

अँधेरे की हिरासत में पड़ी है ज़िंदगी बेसुध
कि अब उस देवकी की गोद में हो रोशनी कान्हा

यही बस 'रीत' की विनती, डगर सच्चाई पे चलकर
सफल हो जाए जीवन की बची हर इक घड़ी कान्हा

- परमजीत कौर 'रीत'
१ सितंबर २०२६

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