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       ग्वाल-बाल कृष्ण हैं

 
गोप-गोपियों के साथ ग्वाल-बाल कृष्ण हैं
प्रेम के पुजारियों को पुष्पमाल कृष्ण हैं

कालिया हो कंस, पापियों के काल कृष्ण हैं
दुष्ट हैं जो पात-पात, डाल-डाल कृष्ण हैं

प्रेम की नदी तो ज्ञान के समुद्र हैं अथाह
मोह की लगी हो जंग, रेगमाल कृष्ण हैं

मन बसी जो राधिका तो प्रीति हो गई अमर
विश्व में विशुद्ध प्रेम की मिसाल कृष्ण हैं

हो पुकार द्रौपदी की या सखा की पीर हो
क्या कहें कमाल मित्र, नंदलाल कृष्ण हैं

सूर्य का प्रकाश और तेज हैं वो अग्नि का
थामना हो धर्म-ध्वज तो धर्मपाल कृष्ण हैं

प्रेम के प्रसंग में उमंग हैं 'बसंत' की
फागुनी छटा में रंग का धमाल कृष्ण हैं

- बसंत शर्मा
१ सितंबर २०२६

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