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       कहो कन्हैया क्यों उदास हो!

 
कहो कन्हैया क्यों उदास हो, गई गेंद फिर यमुना में
हिम्मत करके उतर न जाना, ज़हर घुला है यमुना में

वासुदेव भी तुमको लेकर, कैसे उतरेंगे अब पार
ज़हर उगलते फन हज़ार, फुँकार रहे हैं यमुना में

टैंकर के पनघट पे लल्ला प्यास लिए गोपी बैठी है
ब्रज की प्यास बुझाने को, दो घूँट नहीं है यमुना में

वृंदावन के ग्वाल-बाल सब, रील बनाते डोल रहे
उनकी आँखों के सब सपने, डूब गए हैं यमुना में

जंतर-मंतर गया सुदामा, लाठी खाकर आया है
देख रहा है सूजा चेहरा, झाँक-झाँककर यमुना में

मिलती नहीं दिहाड़ी लल्ला, मनरेगा भी बंद हुआ
मन करता है मैं सो जाऊँ, एक दिन जाकर यमुना में

- आनंद क्रांतिवर्धन
१ सितंबर २०२६

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