अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

       कहो कन्हैया क्यों उदास हो!

 
कहो कन्हैया क्यों उदास हो, गई गेंद फिर यमुना में
हिम्मत करके उतर न जाना, ज़हर घुला है यमुना में

वासुदेव भी तुमको लेकर, कैसे उतरेंगे अब पार
ज़हर उगलते फन हज़ार, फुँकार रहे हैं यमुना में

टैंकर के पनघट पे लल्ला प्यास लिए गोपी बैठी है
ब्रज की प्यास बुझाने को, दो घूँट नहीं है यमुना में

वृंदावन के ग्वाल-बाल सब, रील बनाते डोल रहे
उनकी आँखों के सब सपने, डूब गए हैं यमुना में

जंतर-मंतर गया सुदामा, लाठी खाकर आया है
देख रहा है सूजा चेहरा, झाँक-झाँककर यमुना में

मिलती नहीं दिहाड़ी लल्ला, मनरेगा भी बंद हुआ
मन करता है मैं सो जाऊँ, एक दिन जाकर यमुना में

- आनंद क्रांतिवर्धन
१ सितंबर २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter