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    होली में

हर्ष अद्भुत, तरंग होली में
बजते मन के मृदंग
होली में

ब्रज की गलियों में धूम रंगों की
अनकही प्रीति के प्रसंगों की
श्याम राधा के संग
होली में

होता छूने का यत्न कैसे भी
पर्व पावन है किन्तु सच ये भी
छुप के पलते भुजंग
होली में

मस्त बातों में बह नहीं जाना
उड़ते भँवरे न पास बुलवाना
डस रहे फूल भृंग
होली में

जिनके मन रहे नहीं शोभन
झूमते देखे आज के मोहन
जैसे पी सबने भंग
होली में

दर्द उर में, छुपे प्रसंग कई
चेहरों पर चढ़े हैं रंग कई
कोई लड़ता है जंग
होली में

- प्रो.विश्वम्भर शुक्ल
१ मार्च २०२४
   

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