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   राजनीति मे होली

होली हो ली हो रही
होगी फिर-फिर यार
हाथ जोड़कर घूमिए
गली मोहल्ले द्वार

नेता पिचकारी लिए
वादों का रंग घोल
जोड़-तोड़कर बजाते
अपने अपने ढोल
मतदाता भी लट्ठ ले
बैठा है तैयार

मन में हो आक्रोश पर
बोलें मीठे बोल
सगा न कोई किसी का
खोल सभी की पोल
जैसे भी हो जीतिए
आप न मानें हार

- आचार्य संजीव सलिल
१ मार्च २०२४
   

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