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      बरसे नेह फुहार सा

दिन फागुन के आ गये फूल खिले कचनार
डाल डाल से छूटती रंग भरी रसधार

बाँचे पाती फागुनी बौराए ऋतुराज
रूप रंग रस गंध के खुले द्वार हैं आज

मीत करे अठखेलियाँ छनके बाजूबंद
चुनरी पगड़ी मिल रचें मीठा दोहा छंद

कोयल कूके बाग में झूमे अमुवा डार
लोक गीत में गूँजता होली का त्योहार

स्वाँग रचा कर नाचते ढोल नगाड़ों संग
गली-गली में छा रहा होली का हुड़दंग

सजनी बैठी ओट में गाती राग बहार
सजे सुरीले साज से मन आँगन घर-द्वार

बरसे नेह फुहार सा पिचकारी से रंग
मनभर होली खेलते कान्हा राधा संग

- पारुल
१ मार्च २०२४
   

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