अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

   
 

      
       होली

सप्तरंगी आसमाँ
और इंद्रधनुषी ख़्वाब
उसके...

श्वेत शफ्फाक रंग चांदनी-सा
और तुम श्यामल सरीखे...
बादलों में छिपते
घनेरी स्याह रात संग
एक स्याह रंग यह भी..

मखमली-सी चाहत मेरी
सुनहरे रंग के आखर तुम
हरसिंगार के नारंगी सपने
लाल रक्तिम अब गोधूलि भी
रंग मेरे जिंदगी के तुमसे
कई रंगों से सजी मैं...

लगा लो चाहे रंग तुम कई से
मिले न रंग कोई मुझसा भी
भले रंग लो कई रंगो में
छुड़ा न सकोगे रंग मेरा भी...

अबकी होली में खूब रँगना तुम
भीग लेना मेरे पसंदीदा रंग में
रंगूँगी तुम्हारे रंग में यादों के सहारे मैं
एक मेरी होली तुम बिन यह भी...

- सुरेखा अग्रवाल स्वरा
१ मार्च २०२४
   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter