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       चुनर बसंती

चुनर बसंती भू लहराए
फाग खेलने के दिन आये

भोर गुलाल की थाली लेकर
दिवस के माथे तिलक लगाए

किसने तुमपे ये रंग लगाया
नयन झुके हैं गाल लजाये

मन के पतझड़ से कह देना
तू हरियाए जग हरियाए

कुरजाँ लौट चलीं है घर को
फागुन बिछड़ों को मिलवाए

यह भी 'रीत' है होली की, मिल
शिकवे जाते सभी भुलाए

- परमजीत कौर 'रीत'
१ मार्च २०२४
   

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