अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

   
 

      
        होली की रंगत

यों तो भारतवर्ष है, त्योहारों का देश 
लेकिन है सबके लिए, होली बहुत विशेष

होली की रंगत चढ़ी, बूढ़े हुए जवान 
खुशहाली के रंग रंगा, अपना हिंदुस्तान

हो अधर्म-अनीति का, कितना भी उन्माद 
जल जाती है होलिका, रह जाते प्रहलाद

दिन फागुन सा हो गया, रातें हुईं गुलाल 
तुम आई घर हो गया, पाकर तुम्हें निहाल

स्वर्ग-लोक से देखते, सकल धरा सर्वेश
ब्रज की गलियों सा रंगा, पूरा भारत देश

बरसाना की गोपियाँ, नंदगाँव के ग्वाल
उड़ा रहे हैं साथ में, मिलकर स्नेह-गुलाल

अंग अंग है डोलता, बदल-बदल कर रंग 
सबके मन को छू रहा, फागुन का सत्संग

- सत्यशील राम त्रिपाठी
१ मार्च २०२३

   

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter