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रंग फागुन मत उड़ाना

रंग फागुन मत उड़ाना
वीर! सरहद पर डटा है

लौट आते हो सदा तुम
"वीर" से पहले घरों में
कौन पत्थर बाँध देता
है भला उसके परों में

द्वार फागुन मत बजाना
हृदय चिंता से अटा है

ठंड का मौसम कभी
जाता नहीं, वह कह रहा था
फोन के उस छोर पर वह
कल्ल ही तो दह रहा था

पवन फागुन मत चलाना
नेह का आँचल फटा है

डाकिये की घण्टियों पर
जिंदगी माँ की टिकी है
देखने को आँख भर, कुल
साँस आजी की रुकी है

चंग फागुन मत बजाना
चैन प्राणों का लुटा है

- कल्पना मनोरमा
१ मार्च २०२०

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