अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

 

   फागुनी आकाश

राग रंजित ले हथेली
सुबह से ही
कसमसाता फागुनी आकाश!
एक युग से एक युग तक
क्षितिज अटकी प्यास!!

इस दिशा का गाल
कर दूँ लाल
या कि गहरी झील सी
मदमत्त आँखों पर
हवा का
बाँध दूँ रूमाल

वेदना दाबे अधर में
धुआँ भी आँखों धुमाये
हँस-हँसाता, काश!
कसमसाता फागुनी आकाश!!

रंग टेसू के
नहीं सूखे
पंखुरी तक भिगोने को
नयी साड़ी धारयित्री की
महज़ भूखे!

धूसरित आकांक्षाओं में
स्वयं ही रंग भरता
क्या समय का पाश?
कसमसाता फागुनी आकाश!

- सुभाष वसिष्ठ
१ मार्च २०१९

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter